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KHELNEWZ BILASPUR DESK अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ सफल समापन, भारतीय खेल-दर्शन को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में सार्थक पहल खेल सृष्टि : भारतीय दृष्टि

अटल बिहारी वाजपेई विश्वविद्यालय, बिलासपुर एवं क्रीड़ा भारती, छत्तीसगढ़ प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “खेल सृष्टि : भारतीय दृष्टि” का सफलतापूर्वक समापन हुआ। 29 एवं 30 जून को आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय खेल-दर्शन, सांस्कृतिक परंपराओं, स्वदेशी खेलों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा समकालीन खेल परिदृश्य के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना तथा भारतीय खेल दृष्टि को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त रूप से प्रस्तुत करना था।

द्वितीय दिवस का शुभारंभ तकनीकी सत्रों के साथ हुआ। प्रथम तकनीकी सत्र में श्री सुजीत सोमसुंदर बी, उपाध्यक्ष, कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन ने “आई.पी.एल. की अर्थव्यवस्था एवं भारतीय जीडीपी पर उसके प्रभाव” विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि खेल आज केवल प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, रोजगार, पर्यटन, मीडिया, खेल उद्योग तथा आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। उन्होंने आईपीएल के माध्यम से खेल अर्थशास्त्र के विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

द्वितीय तकनीकी सत्र में डॉ. अजय सिंह राजपूत ने “भारतीय दृष्टि के आधार पर खेलों का विकास” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारत की पारंपरिक खेल संस्कृति केवल शारीरिक दक्षता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नैतिकता, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना एवं व्यक्तित्व विकास का भी आधार है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप खेल शिक्षा के विकास की आवश्यकता पर बल दिया।

इसके पश्चात एक विशेष पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसमें श्री प्रसाद महानकर, श्री सुजीत सोमसुंदर बी तथा ऑस्ट्रेलिया से श्री विजय दुबे ने सहभागिता की। पैनल चर्चा में भारतीय खेल-दर्शन, स्वदेशी खेलों के पुनर्जीवन, खेलों की आर्थिक संभावनाएँ, वैश्विक खेल व्यवस्था, राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा भारत को खेल महाशक्ति बनाने की दिशा में आवश्यक प्रयासों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से अनेक प्रश्न पूछे, जिनका वक्ताओं ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) ललित प्रकाश पटैरिया रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में क्रीड़ा भारती के प्रांत संगठन मंत्री श्री सुमित उपाध्याय तथा विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. तार्णिश गौतम उपस्थित रहे।समापन समारोह को संबोधित करते हुए श्री सुमित उपाध्याय ने भारतीय पारंपरिक खेलों—जैसे पचीसी एवं अन्य घरेलू खेलों—की सांस्कृतिक एवं सामाजिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए युवाओं से इन्हें पुनः अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय खेल हमारी सांस्कृतिक पहचान के अभिन्न अंग हैं तथा इनके संरक्षण से ही स्वस्थ एवं संस्कारित समाज का निर्माण संभव है।

अपने समापन उद्बोधन में कुलपति प्रो. (डॉ.) ललित प्रकाश पटैरिया ने कहा कि यह संगोष्ठी केवल एक शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय खेल-दर्शन को समाज तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण अभियान है। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी से प्राप्त शोध, विचार एवं निष्कर्षों का पुस्तक के रूप में प्रकाशन कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाएगा, जिससे भारतीय खेल चिंतन को व्यापक स्तर पर प्रसारित किया जा सके।

संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी ने दोनों दिनों के आयोजन की रूपरेखा, उद्देश्यों एवं उपलब्धियों की जानकारी देते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. तार्णिश गौतम ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमामय मंच संचालन प्रो. रत्नेश सिंह, जिला सह मंत्री, क्रीड़ा भारती, बिलासपुर द्वारा किया गया।

दो दिवसीय संगोष्ठी में देश-विदेश के विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं खेल विशेषज्ञों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। संगोष्ठी में 60 शोध-सार (Abstracts) प्राप्त हुए तथा 150 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों में भारतीय खेल-दर्शन, खेल मनोविज्ञान, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, खेल अर्थशास्त्र, स्वदेशी खेल, खेल संस्कृति तथा समकालीन खेल चुनौतियों पर गंभीर शैक्षणिक विमर्श हुआ।

इस अवसर पर श्री कौशलेंद्र जी (प्रांत संगठन मंत्री, क्रीड़ा भारती, छत्तीसगढ़), डॉ. अजय सिंह, डॉ. संतोष बाजपेई, डॉ. बसंत आंचल, श्री जगदीश प्रसाद यादव, डॉ. भोजराम रावटे, डॉ. महेश सिंह धपोला, डॉ. विजय कुमार चौरसिया, श्री गोपेश्वर कहरा सहित विश्वविद्यालय परिवार, विभिन्न महाविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी, खिलाड़ी, खेल प्रशिक्षक एवं नगर के अनेक गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

संगोष्ठी का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि भारतीय खेल-दर्शन, स्वदेशी खेलों एवं भारतीय ज्ञान परंपरा को शोध, शिक्षा और व्यवहार के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।

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